Skip to main content

Posts

कविता 17 / कोई कवि नहीं

कोई कवि नहीं फुटपाथ पर चलता हुआ एक आदमी हूँ बीचोबीच भागते वर्तमान का, धुआं  पी रहा हूँ और धुआँ पीकर उगलना धुआँ धूमपान है, कविता नहीं कहते हैं वे  - मैं कवि नहीं और कठिन समय मेंं और कठिन होता कविता का होना, काफी नहीं है कविता के लिए सिर्फ रोना या सिर्फ विरोध, आक्रोश या गाली। वाहवाही या ताली सबूत नहीं इस बात का कि सचमुच कविता हो रही है या कुल्फी मेंं नोंक की ओर जाते जाते आइसक्रीम की तरह कविता खो रही है पता नहीं चलता लेकिन कविता है मौलिक अधिकार आत्मा के राज्य मेंं हरेक जिंदा मनुष्य का और आलोचना है कर्तव्य वहां हर त्रिनेत्रदर्शी  मनुष्य का बिना इनके अराजक -अनिश्चित है आत्मा का संविधान और उसकी प्रस्तावना के सभी शब्द होंगे मुर्दे क्योंकि वहाँ सवाल न रहेगा, न ही आपत्ति और सिर्फ रोना कि समय कठिन है और कठिन है कविता और कहते हैं वे-- बदल नहीं पाएगा सूरज या उससे  पिघलता, चूकर गिरता समय जो दे रहा था धूप और उजाले का अपरिमित,  झूठा एहसास और उसे मैं  कर न महसूस क्योंकि मैं कवि नहीं मैं कवि का पुतला हूं अंदर है सिर्फ घास- फूस। -----2...

गज़ल 29 / आत्मा पर

आत्मा   पर   बर्फ   थोड़ी  डाल देता। सड़न   की   संभावना  तू   टाल देता।। लोग   फंसने   को   यहाँ  तैयार  बैठे सिखा  कोई  फेंकना  भी  जाल देता। आंखें अगर न देखती  सच आज का जुबां  अपनी  भी  जरा  संभाल लेता। एक  ही  था  डूब वो  भी  गया  सूरज काश ! कि इक और  पहले बाल लेता। थार का एहसास गर होता न आंखों में ख्वाब को  हिरनी समझके पाल लेता। मंच  पर  है   नाचना  सबको  अकेला नेपथ्य  में   कोई  नहीं  जो  ताल देता। दर्श गर  तू  सीख  लेता  गज़लगोई भी स्वयं  को  अपने  मुताबिक ढाल लेता। -----25 मई 2018, गोवा।

गज़ल 28 / तोड़कर दीवार भी

तोड़कर   दीवार    भी  तो  देखते। आ  जरा  इस पार  भी  तो  देखते।। ख्वाब  उतरेंगे  जमी  पर  एक  दिन होश  में  इक  बार  भी  तो  देखते। यूं नहीं कहते कि  दिल को रख बड़ा प्यार   का  आकार  भी  तो  देखते। गहन  भीतर  शांति  में  जब बैठ तू उमड़ता  यह  ज्वार भी  तो  देखते। ठूंठ   पर  चिड़ियां   बनातीं  घोंसले काल   की ये  मार  भी  तो  देखते। आंत का भूगोल  जब  भी  खींच तू भूख   का  विस्तार  भी  तो  देखते। लोग   टंगे    हैं    हवा   में   यूं  नहीं कौन   है   सरकार   भी  तो  देखते। दर्श  इतने  गीत - गजलें   क्या  करो जा   कहीं   बाज़ार  भी  तो  देखते। -----24 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा । 2122...

गज़ल 27 / फर्क जो

फर्क जो  मालूम था  क्या आग -  पानी में । काम   आया  जिंदगी   की    बागवानी में ।। थी हकीकत एक ही चारों तरफ पसरी हुई देखी   सभी ने  है  जमीनी -  आसमानी में । पात्रता से  बेदखल जब  जिंदगी  मेरी  हुई पात्र  बनकर  जी  लिया  झूठी  कहानी में । मुर्दे पलों की  ढेर पर   सोता रहा सब दिन जी  सका   न  चार पल  भी  जिंदगानी में। भाए  उन्हें  अपना चना सूखा  भला   क्यूं ? चोंच   जब से  मारते  चुपड़ी   विरानी  में। रास्ता था दूर तक खाली, इधर  कोई  नहीं मील  का   पत्थर   अकेला  था  रवानी में । दर्श तुझको गजल कहनी आ गयी  शायद आने  लगी है अदब,   तेरी   बदजुबानी में !      ---------23 मई 2018              ...

गजल 26 / पूछ मत

पूछ मत कि  क्या लिखी है। जो लिखी उनकी  लिखी है।। शब्द   उनके,  भाव  उनके कुछ नहीं अपनी  लिखी है।। सर्जना    बाजार  में   फिर पूछ मत किसकी  बिकी है।। समय  के   हाथों   बिचारी लेखनी,   सबकी   बिकी है ।। तोड़   कंठी   और   माला बेवजह  तू   क्यों   दुखी है।। देख,    तेरा    वो   पड़ोसी सीख ले कुछ क्यों सुखी है।। उम्मीद ही  होगी कदाचित् दूर   से  जो   भी  दिखी है।। पास  तो  है   एक   खाली बाँसुरी   जो   अनफुंकी है।। -------- 22 मई 2018.

कविता / 16 : मातृ दिवस के बहाने

आओ ढूंढते हैं हम सब आज मातृ -दिवस को इसमें मां कितनी है और कितना दिवस है क्योंकि मुझे लगता है ऐसा गायब है माता और रह गया है सिर्फ दिवस पूरे साल में परिचालित करते हैं हम सब सिर्फ एक बार जैसे कोई बैंक -खाता ताकि रहे जीवित अगले दिवस तक । आओ ढूंढें यह भी कि हम संतान हैं? या फिर उनकी कोख और छाती से खोद निकालते हैंं जीवन और संसाधन चूसते हैं अमृत घर भरते हैं अपना और मां रह जाती है अकेली उस परित्यक्त खदान की तरह अयस्क -शून्य और हम बन जाते हैं बिल्कुल उत्तर आधुनिक संतान की तरह रह जाते हैं इसी दिवस के लिए जो रात से भी काला दिखता है मुझे गंगा नहीं सूखता हुआ नाला दिखता है मुझे । 13/05/2018

कविता 15 / एक और निर्भया

अब है बहुत जरूरी एक बार ठीक से सर्जरी मन की । मन वैयक्तिक या सामूहिक चेतन -अवचेतन मगर रुको इसके पहले बहुत -बहुत जरूरी है समझना -देखना ये ट्यूमर विक्षिप्तता,  हवस,  ...... आदि नामों से कहां -कहां घात लगाकर बैठा है और फटता है अचानक पता चलता है एकाएक हुआ है ...बलात्कार .. एक बच्ची का मासूम बच्ची पड़ी है अस्पताल में लहुलुहान गुमसुम-चुप, लुटी-पिटी मृतवत्  अंदर, और बाहर ? बलात्कार ! बलात्कार  ! जहाँ देखो दूरदर्शन, अखबार ... सुबह -सुबह कामवाली बाई भी घोर कलजुग संवेदनशील प्राणियों की विरोध-सभा में हाहाकार एकाएक हरकत में सरकार घोर कलजुग चौराहे पर, चाय की दुकान पर भी हरेक चुस्की के बाद.. बलात्...... इसलिए जरूरी है इस बार अंतिम रूप से ढूंढना है उस घोर कलजुग को जिसमें रह रह टिमटिमाता है वो ट्यूमर जो बुद्धि को बना देता है भैंस और विवेक को बैल फिर नैतिकता की सारी नसें निचोड़कर वो ट्यूमर बनाता है मन को विकृत , विक्षिप्त और नपुंसक नैतिक रूप से बीमार अर्थात् बलात्कार करता है कोई कमजोर ही जो भी कह लो उसे राक्षस, नरपिशाच, वहशी या दरिं...