Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2018

गज़ल 10/ आज फिर से बादलों ने

आज  फिर  से  बादलों ने  इस  जमी की बात की। जब  हवा  ने  दी  खबर,  गरमागरम   हालात की।। जख्म  पे  चर्चा  चली  थी  देर   तक  चारों  तरफ मगर मरहम की  किसी  ने भी  नहीं कुछ बात की। घर- घर   उजाले -धूप का  जिम्मा लिया तूने मगर लाया कहां सूरज कभी भी सिर्फ उसकी बात की ? खेत  में  जाके  वहां  भी   पूछ   फसलों  से  कभी क्यों किसानों  ने  हमेशा  खुदकुशी   की बात की। आम लोगों से जुड़ा जब भी कभी  उछला  सवाल बात  बनकर  रह गया  हर  बार  वो  जज्बात की। बोझ  सीने  में  लिए  सब  खड़े  होकर हांफते  थे जी  मेरा  हल्का  हुआ  जब  खूब  सबसे बात की। खूब  आएगा  उजाला   कल   सुबह  सबके  लिए ये  खबर  सुन  कौन  लेता भी खबर  इस रात की ? खुल गया है  भेद ...

गज़ल 9/पूरी तरह जब मूल से

पूरी तरह  जब  मूल  से  उखड़ा हुआ हूँ। महसूस  होता  ठूँठ -सा अकड़ा हुआ हूँ।। बहुत खुश था कभी  रिश्तों के समुंदर में रेत  पर  हूँ,   सभी   से  बिछड़ा हुआ हूँ। तुम्हें  लगती  जिंदगी  मेरी सजी - संवरी देख आके , किस कदर बिखरा हुआ हूँ। जिंदगी यह हो गई है  एक  मैराथन यहाँ दौड़ता हूं खूब, महसूसता ठहरा हुआ हूँ। खो  गई   मेरी  जमी  आकाश   छूने  में , चोटियां भी  चढ़  बहुत  पिछड़ा हुआ हूँ। रोज  नीचे   बह  रही  है  जिंदगी  गहरी एक  पुल - सा  मैं  तना   ठहरा हुआ हूँ। क्या करूं कोई शिकायत  भी जमाने से अगर  खुद का ही  बना-बिगड़ा हुआ हूँ। --------26 फरवरी 2018            वास्को दा गामा , गोवा । --------26 फरवरी 2018            वास्को दा गामा , गोवा ।

कविता 5 /किसने ऐसी हवा उड़ाई

निद्रा के उर्वर बागों में सपनों के डंठल पर हंसते आशा के नव फूल खिले थे कभी कल्पना - कोइल की थी जिनमें स्वर-लहरी लहराई जिनको चूमा मानस-भौंरा था जो मेरा जीवन -सौंदर्य कभी और जिनको सहलाया आँखों का था पावन पावस टूट गए वे बिखर गए किसने ऐसी हवा उड़ाई।

गज़ल 8/ सौ बार पहले

सौ  बार  पहले  स्वयं को  मैं तोड़ता हूँ। तब   हथौड़ा  और   पर   मैं छोड़ता हूँ।। तोड़ना  है  इसलिए  भी,  बन सको तुम क्या   बनोगे   मगर  तुम पर  छोड़ता हूँ। जब कभी  है तोड़ता, गजनी तुम्हें आके आ  तभी मैं  तुम्हें  फिर-फिर जोड़ता हूँ। रुख  तेरा  बदला  हमेशा  जिस हवा  ने देख ,  कैसे   रुख   उसी  का मोड़ता हूँ। बन सको भी  आदमी  बेजान पत्थर से दिन-रात अपना सर तभी तो फोड़ता हूँ। दर्श लेकर आ नये  अब बीज ताजा भी आजकल   मिट्टी   नयी   मैं  कोड़ता हूँ। ----२४ / ०२ / २०१८ , गोवा ।

गज़ल 7/आसमां में झाग बाक़ी

आसमां  में   झाग बाक़ी । है  जमीं  पर  दाग बाक़ी ।। आंख  का  पानी  संभालो और  भी  है  आग बाक़ी । कैद  मत   कर  ये  बहारें और  भी है   बाग  बाक़ी । फक्त   रोटी  खा  रहे   वे है  बची  क्या  साग बाक़ी ? गुणा  खुशियों  का  हुआ अब दर्द का है भाग बाक़ी । 'दर्श'  गाता  है  उसे  जो अनछुआ  है  राग  बाक़ी ।

कविता 4/ गुरु के प्रति

                      गुरुवर, तेरे  चरण-तले मैं ,उठ-गिरकर शिशु-सा अनजान ; सीख चुका हूं क्या होता है,जीवन -पथ का गति -विज्ञान । जब-जब  मेरे  निविड़ कंठ में,     गूंजेगा कल- गिरा- गान; तेरी    स्मृति पर ही   होगा,   पहले   सुर  का अर्ध्य -दान। जब-जब होगा,सफल पार्थ का ,जीवन -भेदी सर- संधान; धर  देगा धनु, तूण- तीर सब , द्रोण-चरण यह, साभिमान। जब-जब  मेरे  अंतर  की , प्राची में  कोई  चुपके   आकर , खो जाए फिर दूर  क्षितिज  में गहन लालिमा बिखराकर; तब  - तब  मेरा पंछी  गाए,   तेरी  करुणा  के तरल गीत ; बनी  रहे  तेरे चरणों  से, जनम - जनम   तक सरल प्रीत। जब-जब   मेरे  अंतस्तल से,  फूटेगा   इक  आतुर  निर्झर; उद्दाम  वेग में  उच्छेदित , जब होंगे  पथ के पाहन -प्रस्तर; शक्ति  -...

कविता 3 / तुम चले गए

तुम चले  गए रह गये यहीं , हल, खुरपी, कचिया बैल, बकरिया, गैया, बछिया पूस की गुदरी भोटिया - रतिया, पुरबैया, वर्षा के दिन भींगी अन्हरिया बाँस,  बबूल,  बेर, कनेर पास पुआल की ऊंची ढेर भरी दूध की छोटी मटकी धरी रह गई तुम चले गए पर हाय! धरा यह हरी, रह गई । पर मुझको है विश्वास तुम यहीं कहीं माटी में हो हे माटी के अमर पुजारी तुम चले गए चुपचाप  तुमने सबको देखा तू रहा सदा अनदेखा सह धूप धूल संताप पानी बनकर ज्यों उड़ा भाप एकाएक हे निष्पाप ! तुम चले गए हे महाशुद्ध ! मैं तेरी हड्डी चुनता हूं अस्थि-कलश ले जाऊँगा मैं जहां -जहां  है थार सहारा विराट् पसारा निर्जल बादल का हे, पालनहारा ! सर्वत्र बहेगा तेरा अश्रु -स्वेद बन अमृत - धारा ।

गज़ल 6/रंगीन उजाला

चारों तरफ रंगीन उजाला  नज़र आता है; मुझे   तो   सिर्फ  घोटाला  नज़र आता है । हँस रहे चूहे भी, अब  बिरल्लीनुमा  हँसी, मुझे  फिर  दाल में  काला  नज़र आता है । दस्तखत  को  बेचते जो चंद  सिक्कों  पे, ये  कोई  मंत्री  का  साला  नज़र आता है । दे रहे हो 'दर्श'  फिर  दस्तक फिजूल क्यूं? यहाँ तो  हर द्वार पे, ताला नज़र आता है ।

कविता 2 / मैं और आप

कमजोर हूं, इसलिए मैं चोर हूं । बलवान हैं,इसलिए आप भगवान् हैं । जी, मुझे आती है चोरी की कला, आपको आता है छोंपना गला। गजनी से लेकर गाँधी  की जेब, तरह-तरह की काटी है मैंने, साहेब। एक नहीं , पांच पेट का सवाल है, फिर मेरा क्या? सबका ये हाल है। कौन नहीं चाहता छप्पर की जगह छत? जी, मुझे भी तो है आदमी बनने की लत। वेद वाले दराज में जब बैठा है कीड़ा, बुद्ध तो हूं नहीं कि समझूं मैं पीड़ा । सिक्कों मैं छपते रहे हैं आप, मैं तो सिर्फ दस्तखत करता हूं साब । दूधिया रहे आपका कुर्ता -पाजामा, कुछ भी करेगा ये आपका सुदामा। सिक्ख, इसाई, हिंदू या मुसलमान, सब तरफ तो आप ही हैं अम्लान। पहले तो बम बनकर फटते हैं  आप, फिर ऊँ शांति शांति रटते हैं  आप। बंदूक की नोक पे विश्व को बांटते हैं, देश का नक्शा फिर संसद में साटते हैं । दिल्ली की सांझ और लंदन का सबेरा, सुरक्षित अक्षांश पर आपका है डेरा । आप ही तो हैं मानववाद का आखिरी अंडा, भूखे पेट पर जो गाड़ते हैं झंडा । कभी गरीबी,जहालत तो कभी  भ्रष्टाचार, कुछ न कुछ हटाते ही रहे हैं आप लगातार ।  जनता को जीने का हक द...

कविता 1 /मैंने ये ही सीखे

मैंने ये ही सीखे, जीके, कुछ मीठे , कुछ तीखे, मीठे को चख ,तीखे में तुम चीखे, इसीलिए भख ,जीभर पहले तीखे जीके, मैंने ये ही सीखे । पहले निज, फिर पर-पूरक हो, भव-हालाहल पीके अमृत का अधिकारी तब तू नीलकंठ भी फीके ; जीके, मैंने ये ही सीखे । --------फिर याद आई  कॉलेज के दिनों  की कविता --

गज़ल 5/इस तरह जो आसमाँ में

आसमाँ  में    इस   तरह   छाया  हुआ हूँ। जमी  से  ही  भाप  बन  आया  हुआ हूँ ।। आदमी  मैं  आम हूं  हर बार सदियों से, सोया नहीं हूं  ख्वाब में  सुलाया गया हूँ। सांस भी  मुझको  डराती  खूब अब तो मैं  हवा से  इस कदर   हिलाया गया हूँ। तोड़ना मुझको  नहीं आसान  इतना है वो  घड़ा  हूं,  चोट  से  पकाया गया हूँ। कुछ नया  लगता नहीं आके यहाँ भी, यहां  कितनी  बार  मैं  आया  गया हूँ । इस बार भी खोना नहीं ऐ मीत मुझको गर बड़ी मुश्किल से मैं  पाया गया हूँ ।        ----'19th February 2018              Vasco Da Gama Goa.

गज़ल 4/ पत्थर पे किसी ने

लिखा पत्थर पे किसी ने,सवाल दुबारा क्यूं है? बीच मेें दरिया, दोनों तरफ  किनारा  क्यूं  है ? बस देखते  ही  तुम्हें  समझा  था ये  मैंने , हर शख्स का  चांद की तरफ इशारा क्यूं है । आसमाँ  में  है  उजाला, छत  नहाई  धूप में , मगर नीचे रात का, स्याह -सा नज़ारा क्यूं है ? कर दिया था वक्त ने खामोश ही जिसको सदा, आवाज मेें उसकी किसी ने मुझे पुकारा क्यूं है? हाथ सेंके रात भर  सभी ने तेरे घर जले में हर तरफ चर्चा सुबह  सिर्फ हमारा क्यूं  है ? पसे पर्दा कोई समुंदर उमड़ता है वही सब में , हर आंख से निकला वो पानी खारा क्यूं है ? ----18feb 2018 वास्को द गामा,  गोवा ।

गज़ल 3/ क्या खूब लिखा

कहा सबने - वाह  !  क्या  खूब लिखा। जब सब तरफ तूने वही महबूब लिखा।। अकेले, वक्त के इस भयानक जंगल में बेखौफ, तूने खुद  को  महफूज लिखा। आँधियों की खाक को  पत्थर समझके क्या  खूब  उसपे खुद का वजूद लिखा। छिन गए कागद,कलम भी हाथ से जब आसमाँ  में  उँगलियों  से  खूब  लिखा। इक अदद दुनिया  कहीं है  खूब भीतर जो  लिखा  तूने  उसी  में  डूब  लिखा। कौन समझे  मौन  वे  गहरे  इशारे  भी कबीरा की तरह तूने वही बेबूझ लिखा। लिखा लिखा आह भर क्या खूब लिखा। जो  नहीं  था  उसे  भी  मौजूद  लिखा।। 19th February 2018 वास्को दा गामा, गोवा ।

गज़ल 2/ एक जिंदा को

हर एक जिंदा को नशे में चूर देखा । मौत में सबको बहुत मजबूर देखा ।। ख्वाहिशों  के आसमाँ के, जमी में दफ्न  होने  का  वही  दस्तूर देखा । रिश्ते  करीब लगते हैं बस अंधेरे में उजाले मेें तो अपने भी,थे दूर,देखा । जिंदगी बेशक बहुत ही खूबसूरत है जब किसी ने जी इसे भरपूर देखा। खाक मेें  मिलती  नहीं    ये जिंदगी खाक में भी गर खुदा का नूर देखा। ------21 फरवरी 2018          वास्को दा गामा

गज़ल 1/ बात हो दिल की

बात हो  दिल की,   हिसाब हो कैसे ? खुली आँखों में कोई ख्वाब हो जैसे।। तुम्हें आदत हो  गई है शिकायत की तुम्ही अच्छे,  बाकी  खराब हो जैसे। तेरी परछाइयों  के  डर का असर है, छुप गया मेघ में  आफताब हो जैसे। मन की  बातें  कहां  जाकर सुनाऊं इक  आप  ही  हो  जनाब, हो जैसे। जिस अदा से मुझे  नाचीज समझा वो  अदा  भी  तेरी, अदाब हो जैसे। हवा के  रुख  का  जो इंतजार करे उसके  हाथों में  इन्कलाब हो कैसे ? 22 फरवरी 2018 वास्को दा गामा , गोवा ।