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गज़ल /33 / एक दलदल में

एक दलदल में  फंसा हूं इन दिनों। और भी लगता  धंसा हूँ  इन दिनों। । हो रहा  चढ़ना - उतरना इस कदर महसूस होता  है  नशा हूं  इन दिनों। चढ़ गया सिर  कौन पागलपन मेरे बेवजह  कितना  हंसा हूं  इन दिनों । रस्सियों -सी  बांधती  हैं  कुछ  मुझे महसूस होता है  कसा हूं  इन दिनों । दर्श मुझको ढूंढ  मत  बाहर  कहीं देख रग - रग में  बसा हूँ  इन दिनों । -----३० मई २०१८       वास्को दा गामा,  गोवा ।

कविता विविध / जाग तरुण

जाग,  तरुण-  अरुण  आगे  बढ़। शय्या- शतदल अब दल, पद- तल अलस- कलश- रस छोड़, वीर चल रमणी- क्षिति- रति, यौवन -चुंबन, काम - दहन कर,  व्योमकेश बन उन्नति- गति- अति दृढमति पौरुष बाध साध, बढ़, पथ अबाध चढ़।। धर पग, हो यह हिमनग डगमग ! उठा खड्ग,   अब अंबर से लग भर   हुंकार,   रे  नव  युग  रव ! गूंजे,   जन - मन  में  स्तव  तव करे   नमन   निखिल   भूमंडल, साकार ब्रह्म !नव इला-कला गढ़। जाग,   तरुण -अरुण आगे  बढ़।।  ----1990, भागलपुर । 28 साल पहले की रचना मेरे छात्र जीवन काल की है...शायद अब की दौर में किसी काम की नहीं । लेकिन अजायबघर में लोग अभी भी जाते हैं ...

गज़ल / 32 / भाव भी उठते नहीं

भाव भी उठते नहीं अब  शब्द भी चुप हो गए। सो   गया  संवाद  जैसे   अर्थ  भी चुप हो गए।। आंख  के  आगे   अंधेरा  और  गहरा  हो गया वक्त भी बहरा हुआ फिर  दर्द भी चुप  हो गए। शब्द को आवाज मिलती फूंक से भी आपकी आपसे  उम्मीद  थी  तो आप  भी चुप हो गए। अपहरण  कैसे हुआ  अधिकार का, पूछा गया पक्ष की तो  बात क्या  विपक्ष भी चुप हो  गए। बोलते थे जख्म जबतक  गीत भी आता गया गीत अब आता नहीं है  जख्म भी चुप हो गए। दर्श  गज़लों में दिया  क्यूं  प्रश्न का उत्तर उन्हें नाम लेते ही  गज़ल का  लोग भी  चुप हो गए। ---30 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा ।

गज़ल 31 / हाथ ने

हाथ ने  रोजगार  मांगा  थमा  दो झाड़ू उसे। दवा भी गर मुफ्त मांगी  दो  जरा दारू उसे।। चुन सभी ने  दी अगर  सत्ता  तुम्हारे हाथ में सात फेरे मत समझना  या कि मेहरारू उसे। कैसे करे जनता तेरे  उपचार पर विश्वास भी आजतक  सबने बनाया  सिर्फ बीमारू उसे। अच्छे दिनों का स्वप्न  सीने से सटाए डोलती खूब  तूने अब  बनाया  स्वच्छ  कंगारू उसे। हवन को तैयार हालत में रहेगा देश जबतक मुद्दे  बहुत  मिलते  रहेंगे  खूब  घीढारू उसे। कहता रहेगा दर्श गज़लें सुबह होने तक यहाँ लोग कितना भी कहें मुंहफट गलाफाड़ू उसे। -----२९ मई २०१८, वास्को दा गामा, गोवा।

गजल 30 / कत्ल होता

कत्ल  होता  चौक पे सच  के  सिपाही का। उधर  गाता   राग    कातिल   बेगुनाही का।। शब्द  कल मारा गया, अब क्या  करोगे भी मौन   लेकर   चश्मदीदों   की   गवाही का ? जंगल उगाता सिर्फ चल, ये  पूछ मत कोई पर्यावरण  किसने  बिगाड़ा लोकशाही का। बहुत कोशिश  हुई  लेकिन आँकड़ों  में, है हो  न  पाया  तर्जुमा   उनकी   तबाही का। देख लेना  सरहदों पे  गांव या खाली मकां आएगा   मतलब  समझ  में  बेपनाही का। मछलियाँ छोटी मरें पर मोटियां  मस्ती करें जाल  इक  ऐसा  लगा  भी   है उगाही का। थके-प्यासे ख्वाब कोई मर नहीं जाएं कहीं पानी  पिला  दे  दर्श  तू  अपने सुराही का। ---29 मई 2018 , गोवा।

कविता 17 / कोई कवि नहीं

कोई कवि नहीं फुटपाथ पर चलता हुआ एक आदमी हूँ बीचोबीच भागते वर्तमान का, धुआं  पी रहा हूँ और धुआँ पीकर उगलना धुआँ धूमपान है, कविता नहीं कहते हैं वे  - मैं कवि नहीं और कठिन समय मेंं और कठिन होता कविता का होना, काफी नहीं है कविता के लिए सिर्फ रोना या सिर्फ विरोध, आक्रोश या गाली। वाहवाही या ताली सबूत नहीं इस बात का कि सचमुच कविता हो रही है या कुल्फी मेंं नोंक की ओर जाते जाते आइसक्रीम की तरह कविता खो रही है पता नहीं चलता लेकिन कविता है मौलिक अधिकार आत्मा के राज्य मेंं हरेक जिंदा मनुष्य का और आलोचना है कर्तव्य वहां हर त्रिनेत्रदर्शी  मनुष्य का बिना इनके अराजक -अनिश्चित है आत्मा का संविधान और उसकी प्रस्तावना के सभी शब्द होंगे मुर्दे क्योंकि वहाँ सवाल न रहेगा, न ही आपत्ति और सिर्फ रोना कि समय कठिन है और कठिन है कविता और कहते हैं वे-- बदल नहीं पाएगा सूरज या उससे  पिघलता, चूकर गिरता समय जो दे रहा था धूप और उजाले का अपरिमित,  झूठा एहसास और उसे मैं  कर न महसूस क्योंकि मैं कवि नहीं मैं कवि का पुतला हूं अंदर है सिर्फ घास- फूस। -----2...

गज़ल 29 / आत्मा पर

आत्मा   पर   बर्फ   थोड़ी  डाल देता। सड़न   की   संभावना  तू   टाल देता।। लोग   फंसने   को   यहाँ  तैयार  बैठे सिखा  कोई  फेंकना  भी  जाल देता। आंखें अगर न देखती  सच आज का जुबां  अपनी  भी  जरा  संभाल लेता। एक  ही  था  डूब वो  भी  गया  सूरज काश ! कि इक और  पहले बाल लेता। थार का एहसास गर होता न आंखों में ख्वाब को  हिरनी समझके पाल लेता। मंच  पर  है   नाचना  सबको  अकेला नेपथ्य  में   कोई  नहीं  जो  ताल देता। दर्श गर  तू  सीख  लेता  गज़लगोई भी स्वयं  को  अपने  मुताबिक ढाल लेता। -----25 मई 2018, गोवा।