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Showing posts from April, 2018

कविता 12 / सड़क के ठीक बाईं ओर

बरसों बाद कान में फिर गूंजी ट्रन-ट्रन ट्रन-ट्रन ........ घंटी एक साइकिल की बरसों बाद आंखों में पानी भी उतरा बहुत गहरा डूब गयी उसमें घंटी सहित साइकिल नहाकर निकली तरोताजा फिर बजी ट्रन-ट्रन ट्रन-ट्रन ... सड़क के ठीक बायीं ओर एक अनुशासित नागरिक की तरह उसे चलाता हुआ पहुंचता था रोज वह छोटा -सा दम खींचता प्रेस -कार्यालय सड़क के ठीक बाईं ओर देश समाज और नयी कविता हाशिये पर खड़े लोग पिछड़े -दलित वर्ग दिग्भ्रमित युवा नरक को निकाल देश से, देश को कैसे बनाना स्वर्ग और हम सब स्वर्गवासी कैसे बनेंगे एक विराट् प्रश्न परिचर्चा होती थी विचार-मंथन, रणनीति लेखन की मीमांसा भी किसी सार्वजनिक भाषण की होते थे सब चुप या मौन जब बात आती थी राशन की क्योंकि एक घंटी बजती थी पेट में भी रह - रहकर सामने बीच चौक पर जैसे घंटा-घर की सुई खूब धुनते थे रुई विचारों -वादों - आदर्शों की बहुत चिंता थी सबको देश के कल और परसों की घंटी बजती थी सड़क के ठीक बायीं ओर.... और वह साइकिल पुरानी जर्जर उसने मुझे दी थी मुस्कुराते हुए शायद बोल नहीं पाए थे '' मैं आपको इससे अधिक दे ही क्या सकत...

गज़ल 24 / महफिलें अब न लगा

महफिलें अब न लगा, गुल न खिलाओ गज़लों में। आ जरा सड़कों से अब आंखें मिलाओ गज़लों में।। पानी अभी भी  पीने  का  है  नहीं  मयस्सर जिन्हें उनको बुला भी आह भर पानी पिलाओ गज़लों में। पेड़ तो  है   रोटियों  का ,  छांह में  वे   भूखे  बैठे जरा  इसकी डाल भी आके    हिलाओ गज़लों में। बेचना चाहो अगर कुछ बिकता ही है बाज़ार में वो बेचना खुद को अगर तो आंसू  मिलाओ गज़लों में। ओढ़कर ख्वाबों को  वे तो  सो  रहे  हैं सदियों  से भूख  गर  सोती  नहीं  तो  मत सुलाओ गज़लों में। कंधे हजारों  बेबसी के हैं टिके वे देख  कंधे से तेरे वाह सुनकर भी कभी न, कंधे  भुलाओ गज़लों में। वही   चादर  है  बनानी   गर  नये  धागे   से  फिर कोई  नया  भी  हो  रफूगर  तो  बुलाओ गज़लों में। आज तक वे ला न पाए  चांद को अपनी जमी पर आएगा  वो  आज गर दिल  से  बुलाओ गज़लों में। ----पुन...

गज़ल 23 / ठोकरें खाके भी

ठोकरें खाके भी फिर से संभलना सीखा । अपने पैरों पे अब मैंने भी चलना  सीखा ।। बनके पत्थर तो हासिल कुछ भी न हुआ बर्फ बनके ही सही लेकिन गलना सीखा । कैसे कह दूं, कोई  खूबी नहीं  पड़ोसी  में उनकी खूबी पे  उनसे ही  जलना सीखा। सुबह होगी, मेरे जाने पे, यकीं  है मुझको मैंने सूरज से नहीं, रातों से ढलना सीखा । मेरे  पैरों की  निशानी न  मिलेगी  उनको मैंने रेतों पे  माथे के बल ,  चलना सीखा । तूने  पेड़ों   पे  उछाले   हैं   प त्थर  इतने   लो,  इन्होंने भी  पत्थर ही फलना सीखा । उनके खारे समुंदर का डर नहीं कुछ भी उनकी पलकों में  पानी पे पलना सीखा । ------दिलीप कुमार दर्श       16 अप्रैल 2018 Please visit my blog for all poems/gazals just in one click http://merihindirachna.blogspot.in

गज़ल 22 / बांधकर खींचती हो

बांधकर  खींचती  हो  अपनी ओर, कविता ! बहुत  मजबूत  है   तेरी  यह   डोर, कविता !! खींचना जितना  तुम्हें है , खींच  ले  मुझको, लकीर हूं  ऐसी कि है न  कहीं छोर, कविता ! तेरी  हस्ती का  एहतराम जो  किया  हरदम तुम  समझते  रहे , मैं   हूं  कमजोर, कविता ! जो भी  सुनाता हूँ  मैं , सबके घर-घर जाके तेरे सीने से  ही चुराया  हूं वो शोर, कविता! अपनी मुट्ठी  से निकालो भी  सूरज अब तो बंद  कबतक  खयालों में रहे भोर, कविता!            स्वरचित,  11 अप्रैल  2018 ।

गज़ल 21 / बात भी ऐसी

बात भी  ऐसी  कि खुद  निकलती नहीं है। मेरी  भी  जुबां  अब  तो फिसलती नहीं है।। वे भी चुप हैं ,मेरी चुप्पी की वज़ह सुनकर आग ठंडी  है अभी, पीर  उबलती नहीं है। धूप तो आके गई  है  बहुत बार ही  लेकिन ये  बर्फ  ही  ऐसी  है कि  पिघलती नहीं है। कहो तो उंगली से  ही  चिनगारी  लिख दूं कलम मेरी भी अब आग  उगलती नहीं है। सबके सीने में इक लौ तो दिखती है यारो बहुत जलती है वो लेकिन मचलती नहीं है। बूंद - बूंद  बनके,  कितना ढोया हूं  तुमको ऐ समुंदर !अब तेरी हस्ती संभलती नहीं है। लौटकर  जाएंगे   वे  भी  खाली ,  यहाँ  से तेरे गीतों से मेरी गज़ल भी बहलती नहीं है।    --------10 अप्रैल  2018,              वास्को दा गामा, गोवा ।

कविता 11 / आपत्ति है

आपत्ति है कुछ मित्रों को मुझपे नहीं , मेरे शब्दों पर उनके मिज़ाज पर, उनके निहितार्थ पर शब्दों की सामयिकता सामर्थ्य पर आपत्ति हो सकती है होनी ही चाहिए क्योंकि आपत्ति ही जिंदा होने का सबसे बड़ा सबूत है और वहीं से शुरू होती है नये की संभावना क्योंकि सहमति के आरामदेह वातानुकूलित कक्ष में हृदय सिर्फ धड़कता है वक्ष में आपत्ति ही क्यों ? मित्रो ! संदेह भी करो मुझपे नहीं , मेरे शब्दों पर उनकी क्षमता पर उनके ईमान , सत्य - निष्ठा पर संदेह करो अवश्य उनकी प्राण - प्रतिष्ठा पर चरित्र पर भी क्योंकि संदेह के सूखे आकाश में ही किसी दिन उमड़ेंगे घनीभूत श्रद्घा के बादल संदेह ही बताएगा शब्दों में अर्थों के कितने चोर -दरवाजे हैं या कि इनमें प्रजा कितनी है कितने राजे -महाराजे हैं संदेह ही बताएगा फिर जरूरी है सवाल भी मुझसे नहीं , मेरे शब्दों से कविता से पूछो अवश्य लेकिन जवाब की गारंटी नहीं है क्योंकि जवाब इतना आसान नहीं है क्योंकि वास्तव में कोई शाश्वत समाधान नहीं है और सवाल भी हमेशा दरअसल वही नहीं है और ये तो कविता है ट्रीटमेंट पैकेज या टोना -टोटका नहीं जीवित रखेग...

कविता 10 / पहली बार

ये ......तंत्र है जो भी लगा लो इसके पहले प्रजा, लोक,  भीड़  .....वगैरह वगैरह वो इसके ठीक पीछे चलता है बिल्कुल डब्बे जैसे पीछे और रेल की इंजन आती है बाद में लेकिन चलती है आगे आगे धड़-धड़-धड़म-धुड़ुम-धड़ाम........ इसे सपाटबयानी समझो या कि कविता कोई फर्क नहीं क्योंकि सच्चाई यही है और इसे कहने में सिर्फ कविता ही समर्थ है। क्योंकि ये तंत्र है इसे लोको पायलट दौड़ाता है पहले से तयशुदा पटरियों पर देश को आगे ले जाना है बहुत आगे... पीछे डिब्बे में बिठाकर लोग एक सौ पच्चीस करोड़ नवजात शिशुओं को मिलाकर सिर्फ उन्हें मत गिनो जो पैदा नहीं हुए लेकिन पेट में हैं और जिनका आधार कार्ड नहीं है लेकिन डिब्बे में वे भी हैं क्योंकि देश का दूर भविष्य हैं वे भी ले जाना है आगे सबको विकास, सतत विकास ...सब्सिडी बांटनी है चावल दाल और आटा भी ध्यान रहे अगले मार्च तक कम करना है राजकोषीय घाटा भी कर भी बढ़ाने हैं शनै: शनैः उगाही की पुरानी पाइपलाइन को लीकेज प्रूफ भी बनाना है क्योंकि घर घर सबेरा जो पहुंचाना है हरेक आदमी जिंदा या मुर्दा अपने पैरों पर खड़ा होगा पहली बार रोजगार नह...

कविता 9 / ऊपर से आह्वान है

रोको इसे रोको इधर ही आ रही है हंगामेदार शोर सुनामी-सा उठता हुआ शोर को  चीरकर लगातार स्पष्ट  होते नारे .........जिंदाबाद ........मुर्दाबाद ....... खतम करो,  खतम करो .. ........मंजूर नहीं , मंजूर नहीं .......पूरी हों,  पूरी हों ... अपने -अपने हथियार अपनी- अपनी पसंद के लाठी-डंडे डीजल पेट्रोल कीचड़ कालिख टमाटर अंडे तोड़- फोड़, अपने अपने आक्रोश के हिसाब से इधर ही आ रही है सड़क को जैसे दबाती-दबोचती उमड़ती भीड़ इधर ही आ रही है। कौन लोग हैं ये ? इतना आक्रोश ? ये क्या ? मूर्ति तोड़ दी ? बीच चौराहे पर पुलिस बेबस , मूकदर्शक,  निर्वाक् इतनी नफरत ? कि नीचे गिरे टुकड़ों पर कालिख पोत रहे हैं ? ये तो तय है यह कोई महापुरूष था लेकिन इस भीड़ का नहीं था पहचान की अपनी कसौटी के मुताबिक सालों पहले कभी इतिहास में इस पुरूष ने कुछ कहा - किया था ऐसा भीड़ को लगा आज अभी सही मौका है पुराने हिसाब चुकाने का सही समय है सबको बताने का कि लोकतंत्र में विरोध सामूहिक प्रतिशोध का भी एक नाम है । अरे ! ये क्या ? वह नौजवान बोतल खोल खुद पर डाल रहा पेट्रोल बोला - '...

कविता 8 / बांटो मत

बांटो मत मुझे बांएं और दाएं में मैं कोई सड़क नहीं बांटो मत मुझे आगे और पीछे में मैं कोई जुलूस नहीं बांटो मत मुझे पूरब में पश्चिम में मैं कोई आकाश नहीं बांटो मत मुझे न ही गाय में सुअर में मैं कोई जानवर नहीं हांक दो या दबा दो दांत में दो भूखे जबड़ों के बीच बांटो मत या किन्हीं  खटालों में क्योंकि ये सड़क व जुलूस से लेकर जानवर तक और जो भी विभाजक हैं सब तुम्हारे आविष्कार हैं या फ़िर वे तुम्हारे अहंकार हैंं कि सिर्फ वे ही सही हैं और चलता हुआ आदमी गलत क्योंकि सुनो अब मैं समझ गया हूँ कि मैं इस पृथ्वी की जीवित मिट्टी हूँ अदद जिसके भीतर खूब भीतर एक चट्टान है हमेशा जवान तरोताज़ा तरल भी रज-वीर्य -सा अखंड भीतर मत समझना इसलिये मैं अलग हूं उन अनन्त अनन्त दूर अति दूर गोल -अगोल पिंडों -महापिंडों से ब्रह्मांड के। इसलिये भूल दुहरा नहीं ! क्योंकि इस भूल की सजा तुम्हें मिली नहीं कभी मिली है मुझे ही बार -बार बंटना पड़ा कटना पड़ा टुकड़ों-पुर्जों में मुझे ही बार -बार बेवजह क्यों ?? तुम्हारे बेजान दर्शन -वाद-सिद्धांत ने ली है कितनी जान ! कितनी बार मुझे ...

गज़ल 20 / कौन- सी धूल ये

कौन- सी धूल ये चारों तरफ छाई हुई है । जमीनी  बात  ही जैसे  कि  हवाई हुई है।। देखनी है  तो  नज़र  और  पैनी कर  लो ये जो तस्वीर है अंधेरों में  खिंचाई हुई है । और  भी  भरके  आई  हैं  फसलें  उसमें, धूप से मेरी मिट्टी  की जो  सिंचाई हुई है। कितने छोटे  लगते हो  तुम यहाँ  से अब मुझे  हासिल  ये   जबसे   ऊंचाई  हुई  है। 

कविता 7 / ऐ कबूतरो !

ऐ कबूतरो ! पहले जरा नीचे दर्द में उतरो, फिर तेरी हरेक गूंटर-गूं बनेगी एक अदद कविता । ऐ कुत्तो ! मत चौंको, बेवजह मत भौंको आधी निःशब्द रात को सो रहा है सामाजिक प्राणी, सही समय भांप भौंको साक्रोश तो होगी दर्ज एक और कविता । फिर सभी पढ़ेंगे उसे, सभी जगह चर्चा होगी पुस्तकें छपेंगी उसपे फिर उन्हें सब पढ़ेंगे अर्थ ढूंढेंगे अपनी अपनी सुविधा या स्वाद के मुताबिक जुगाली करेंगे या थूकेंगे फिर कहेंगे मिल गयी कालजयी कविता जिसे ढूंढ रहे थे हम सड़क, गली, मुहल्ले में खेत-खलिहानों, पगडंडियों में फिल्म,  फेसबुक, ट्विटर पे गूगल या अखबारी मंडियों में विज्ञापनों मेें यहाँ तक कि क्रिकेट के बल्ले में.......... नित नये उपमान बिम्ब या नयी अभिव्यंजना -शैली की खोज में आखिर मिल ही गई एक कालजयी कविता कहेंगे लोग फिर भूल ही जाएंगे तुम कबूतरों को कुत्तों को सिर्फ गूंटर-गूं और भौंक ही बचेगी नीचे ऊपर रहेगा लिखा एक कालजयी कविता। ............ और तुम हाशिये पर कालबाह्य काल-विजित या कवलित जो भी कह लो।