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गज़ल 14/ बात से भी तो बात नहीं


बात  से   भी   बात  नहीं   बनी  देखी।
जंग   फिर  सरहदों  पे  है  ठनी  देखी।।

चली थी  चाय  जबतक   मेज  पर  वो
चुस्कियों  में यूं  पिघलती दुश्मनी देखी।

चाय  थी   या  सुलह  की  कोशिश थी
खत्म  होते  ही,   मेज  भी तनी देखी।

बादलों  में   भी  छिड़ी  थी  जंग  कोई
बिजलियाँ भी  खून में  थी  सनी, देखी।

दोनों तरफ था मातमी मनहूस सन्नाटा
न   दीवाली   न   ईद  भी   मनी, देखी।

खूब गहरा रात का  था गंभीर  सन्नाटा
पर  सुबह  अखबार  में सनसनी देखी।

द्वार- खिड़की अभी खोले  उन्होेंने भी
जब  पड़ोसी ने  मेरे  घर  रोशनी देखी।

फिर  उठा  संवाद  ठंडी  राख  से  था
संभावना फिर अम्न की वो घनी देखी।




---------9 मार्च 2018
           वास्को दा गामा,
           गोवा ।











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