मुझे खुद की नहीं है फिकर अब तो ।
कोई करता नहीं मेरा जिकर अब तो।।
कोई चर्चा भी नहीं होती कहीं मेरी,
ना ही बनता हूँ कोई खबर अब तो ।
सिर्फ रस्ता है, कहीं मंजिल नहीं है,
खत्म होता नहीं मेरा सफर अब तो ।
फसल खुशबू की मेरी सूखी है जबसे ,
हवा भी आती नहीं है इधर अब तो।
टीस रह रहके फट जाती बुलबुलों-सी
दिल में उठती नहीं है लहर अब तो।
आदत नहीं है मुझे ,इतनी रोशनी की
कहीं जाकर इसे डालो उधर अब तो।
वक्त वेश्या है बखूबी मैं जभी समझा
खूब संभला हूँ, गया सुधर अब तो।
बड़ी चादर रिश्तों की हो ,रफूगर भी,
चलो, ढूंढें कोई ऐसा शहर अब तो ।
22 मार्च 2018
वास्को दा गामा, गोवा।
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