तुझमें अपने बचपन की मासूमियत देखी।
जो भी देखी तेरी आँखों में हकीक़त देखी।।
ये जो बच्चे हैं ,खिले फूल हैं ,ताजा जैसे
इनकी सूरत में, जमीं पर ही जन्नत देखी।
कितने खुश हैं वे मिट्टी के घरौंदे बनाके
उनकी आँखों से खेल की असलियत देखी।
जान नन्हीं सी नहीं खेली जिस आंगन में
एक अलग ही वहां सबकी तबीयत देखी।
जिक्र है उसमें , सिर्फ नन्हे फरिश्तों का
ऐ खुदा! आज तेरी लिखी वसीयत देखी।
-------- 1 मार्च 2018
--------- वास्को दा गामा, गोवा ।
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