Skip to main content

Posts

गज़ल 19 / बेवजह थे हम तो बिछड़े

बेवजह थे  हम तो बिछड़े , बेवजह  मिले  फिर से। शुरू तो  करें  अभी  रिश्तों के  सिलसिले  फिर से ।। मेरी भी तो  कोशिश  है  अब  साथ  ही  चलूं  तेरे , मंजिलें  मिलें न  मिलें  पर  साथ तो मिले फिर से। ख्वाहिशों की  खुशबू  फैली  घर के कोने - कोने में उम्मीदों  के  सौ - सौ जैसे  फूल  हैं  खिले  फिर से। चलो डोर रिश्तों की फिर आजमाएं  खींचकर हम तुम भी कुछ करो शिकवे ,मैं भी कुछ गिले फिर से। छोटे -  छोटे  बच्चे  हों   छोटे -  छोटे  ख्वाब  जैसे घरौंदे  हों  मिट्टी के  फिर ,  रेत  के  किले  फिर से । बुझाया  हूं अपने  घर की आग  खुद ही जलकर मैं  किसी भी  पड़ोसी का  बस घर  नहीं  जले फिर से। खबर  थी  कि  आसमाँ  ने  बादलों  में  रत्न  घोले पत्थरों  की  बारिश में  हम  रात-भ...

कविता 6 / आप कितने भले हैं !

आप जो मेरे तलवों तले हैं । देखिए जो मेरे उल्टे चले हैं, सर से पांव तक गले हैं, फिर आप तो भले हैं , जानते हैं जीवन के ढंग और ढोंग सुयोग - दुर्योग तभी तो आपको ये पैर न खले हैं । आप कितने भले हैं । ( कॉलेज के दिनों की रचना ) --------पुनर्संकलित           26 मार्च  2018           वास्को दा गामा, गोवा।

गज़ल 18 / मुझे खुद की नहीं

मुझे खुद की नहीं है  फिकर अब तो । कोई करता नहीं मेरा जिकर अब तो।। कोई  चर्चा भी नहीं  होती  कहीं  मेरी, ना  ही  बनता हूँ  कोई  खबर अब तो । सिर्फ रस्ता  है, कहीं  मंजिल नहीं है, खत्म होता नहीं  मेरा  सफर अब तो । फसल खुशबू की मेरी सूखी है जबसे , हवा भी  आती  नहीं है  इधर अब तो। टीस रह रहके फट जाती बुलबुलों-सी दिल में  उठती नहीं है  लहर अब तो। आदत नहीं है मुझे , इतनी रोशनी की कहीं जाकर इसे डालो उधर अब तो। वक्त वेश्या है बखूबी मैं जभी समझा खूब  संभला हूँ, गया  सुधर अब तो। बड़ी चादर रिश्तों की हो ,रफूगर भी, चलो, ढूंढें  कोई  ऐसा  शहर अब तो ।                22 मार्च  2018                वास्को दा गामा, गोवा।

गज़ल 17 / क्यों नहीं आता कोई

क्यों न आता इधर  कोई  आज उसकी छांव में। सोचकर ये  मर  रहा,  बरगद  अकेला  गांव में।। बैठ  छत  पे  फिर  सुनाए  रोज  अंदेशा  कोई ढूंढता  हूं  आज  कौए , इस  शहर की कांव में। ठंड  रातों को अंगीठी , खाट  के नीचे  लगाए था  पकाता  ख्वाब   को  गरम - मीठी ताव में। फिर  लगी  थी होड़ इक  आगे  निकलने  की या  दिखे  थे  दौड़ में  या  तो  फंसे थे  दांव में। दूर  कर  देगी   मुझे   रफ्तार  तेरी  एक  दिन चाहता  जी  बांध  दूं  पत्थर ,  तुम्हारे  पांव में। एक  पुल - सा  जी  रहा  हूं,  सोचता  भी  हूँ, नदी का थोड़ा - बहुत  एहसास तो था नाव में। समय तो था साफ  गंजा सिर  हो सपाट जैसे उसपे उगाके बाल, मैं तो खो गया उलझाव में।           22 मार्च 2018       ...

गज़ल 16 / तू है कातिल

तू  है  कातिल ,  तेरी अदा कातिल। जैसे हो खुद ही  मेरा खुदा कातिल।। जान उनसे  बची  तो  ले  लेना तुम पहले तो उनसे  मुझे  बचा कातिल। रोज मरने की  मुझे लत-सी लगी है तेरी तलवार में भी है  नशा कातिल। वो भी अब मरने की तैयारी कर लें, पूछता  उनका भी है  पता कातिल। किसकी बारी,अभी आगाह  कर दूं, शिकार अगला  जरा  बता कातिल। सबूत मिटता है नहीं   मेरे मिटने का चाहे जितना भी उसे मिटा कातिल। अब जभी हो मौज  तेरी,  देना गिरा मैंने सर कब से दिया झुका कातिल। खुदी  मेरी  भी उड़ी है खाक बनके अब  तो  परदा  जरा  उठा कातिल।     --17 मार्च 2018        वास्को दा गामा ,                      गोवा ।

गज़ल 15 / कल वो फिर मुझसे

कल वो फिर मुझसे जब जुदा होगा । मेरे   ही  पास  नहीं मेरा खुदा होगा ।। मुझे मालूम है कि है तू अवारा हवा, आज  ये  घर है,  कल  दूसरा होगा। जब कभी आओगे तो मैं हूंगा नहीं नाम मेरा वहां  दीवार पे खुदा होगा। वक्त जिद्दी था पैदाइशी , बच्चों सा , रोकने  से  भी , क्या वो रुका होगा? मेरे हिस्से का अंधेरा सब मुझे दे दो अब तो कंधा  तेरा भी  दुखा होगा । रोशनी कम थी धुआं ही ज्यादा था, खुद में घुट- घुटके दीया बुझा होगा । वक्त! बरसा नहीं  और पानी मुझपे, जख्म फिर  वरना,  मेरा हरा होगा । सर झुका  तूने  बहुत  सिज्दे किये सर झुकाने से क्या सर गिरा होगा? ------------11 मार्च 2018                वास्को दा गामा, गोवा ।

गज़ल 14/ बात से भी तो बात नहीं

बात  से   भी   बात  नहीं   बनी  देखी। जंग   फिर   सरहदों  पे  है  ठनी   देखी।। चली थी  चाय  जबतक   मेज  पर  वो चुस्कियों  में यूं  पिघलती दुश्मनी देखी। चाय  थी   या  सुलह  की  कोशिश थी खत्म  होते  ही,   मेज  भी तनी देखी। बादलों  में   भी  छिड़ी  थी  जंग  कोई बिजलियाँ भी  खून में  थी  सनी, देखी। दोनों तरफ था  मातमी मनहूस सन्नाटा न   दीवाली   न   ईद  भी   मनी, देखी। खूब गहरा रात का  था गंभीर  सन्नाटा पर  सुबह  अखबार  में सनसनी देखी। द्वार- खिड़की अभी  खोले  उन्होेंने भी जब  पड़ोसी ने  मेरे  घर  रोशनी देखी। फिर  उठा  संवाद  ठंडी  राख  से  था संभावना फिर अम्न की वो घनी देखी। ---------9 मार्च 2018            वास्को दा गाम...