Skip to main content

गजल / 40 / आखिरी सीढ़ी पकड़


आखिरी  सीढ़ी पकड़  वो जो खड़ा है आदमी।
देखता है  किस  तरह  छोटा - बड़ा है आदमी।।

खाक से बाहर निकल वो आएगा वापस कभी
ख्वाहिशों  की  कब्र  मेें  जिंदा  गड़ा है आदमी।

फिक्र उनको है मकां  या बस्तियां खाली न हो
देखता   कोई    नहीं    खाली  पड़ा है आदमी।

---31/07/2018, गोवा।



2122 2122 2122 212

Comments

  1. 2018 का 31.08 Abhi kaha aaya?

    ReplyDelete
  2. Vaise Goa me ho to aisi mistake hone ke chance badhte hai par aisi sundar rachana ke liye creativity bhi badhti hai..

    Behad shaandaar...aadmi ko aadmi se bhi upar jataati hai aapki ye rachna

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर। sorry for putting wrong date perhaps in flow i lost the sense of time...ha ha ha...thanks and regards for your love ..

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

गज़ल 17 / क्यों नहीं आता कोई

क्यों न आता इधर  कोई  आज उसकी छांव में। सोचकर ये  मर  रहा,  बरगद  अकेला  गांव में।। बैठ  छत  पे  फिर  सुनाए  रोज  अंदेशा  कोई ढूंढता  हूं  आज  कौए , इस  शहर की कांव में। ठंड  रातों को अंगीठी , खाट  के नीचे  लगाए था  पकाता  ख्वाब   को  गरम - मीठी ताव में। फिर  लगी  थी होड़ इक  आगे  निकलने  की या  दिखे  थे  दौड़ में  या  तो  फंसे थे  दांव में। दूर  कर  देगी   मुझे   रफ्तार  तेरी  एक  दिन चाहता  जी  बांध  दूं  पत्थर ,  तुम्हारे  पांव में। एक  पुल - सा  जी  रहा  हूं,  सोचता  भी  हूँ, नदी का थोड़ा - बहुत  एहसास तो था नाव में। समय तो था साफ  गंजा सिर  हो सपाट जैसे उसपे उगाके बाल, मैं तो खो गया उलझाव में।           22 मार्च 2018       ...

गज़ल 28 / तोड़कर दीवार भी

तोड़कर   दीवार    भी  तो  देखते। आ  जरा  इस पार  भी  तो  देखते।। ख्वाब  उतरेंगे  जमी  पर  एक  दिन होश  में  इक  बार  भी  तो  देखते। यूं नहीं कहते कि  दिल को रख बड़ा प्यार   का  आकार  भी  तो  देखते। गहन  भीतर  शांति  में  जब बैठ तू उमड़ता  यह  ज्वार भी  तो  देखते। ठूंठ   पर  चिड़ियां   बनातीं  घोंसले काल   की ये  मार  भी  तो  देखते। आंत का भूगोल  जब  भी  खींच तू भूख   का  विस्तार  भी  तो  देखते। लोग   टंगे    हैं    हवा   में   यूं  नहीं कौन   है   सरकार   भी  तो  देखते। दर्श  इतने  गीत - गजलें   क्या  करो जा   कहीं   बाज़ार  भी  तो  देखते। -----24 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा । 2122...

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले