बेवजह थे हम तो बिछड़े , बेवजह मिले फिर से। शुरू तो करें अभी रिश्तों के सिलसिले फिर से ।। मेरी भी तो कोशिश है अब साथ ही चलूं तेरे , मंजिलें मिलें न मिलें पर साथ तो मिले फिर से। ख्वाहिशों की खुशबू फैली घर के कोने - कोने में उम्मीदों के सौ - सौ जैसे फूल हैं खिले फिर से। चलो डोर रिश्तों की फिर आजमाएं खींचकर हम तुम भी कुछ करो शिकवे ,मैं भी कुछ गिले फिर से। छोटे - छोटे बच्चे हों छोटे - छोटे ख्वाब जैसे घरौंदे हों मिट्टी के फिर , रेत के किले फिर से । बुझाया हूं अपने घर की आग खुद ही जलकर मैं किसी भी पड़ोसी का बस घर नहीं जले फिर से। खबर थी कि आसमाँ ने बादलों में रत्न घोले पत्थरों की बारिश में हम रात-भ...
गाओ नहीं, सुनो सुर मेें तो कविता आती है। ---दिलीप कुमार दर्श