Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2018

गजल / 40 / आखिरी सीढ़ी पकड़

आखिरी  सीढ़ी पकड़  वो जो खड़ा है आदमी। देखता है  किस  तरह  छोटा - बड़ा है आदमी।। खाक से बाहर निकल वो आएगा वापस कभी ख्वाहिशों  की  कब्र  मेें  जिंदा  गड़ा है आदमी। फिक्र उनको है मकां  या बस्तियां खाली न हो देखता   कोई    नहीं    खाली  पड़ा है आदमी। ---31/07/2018, गोवा। 2122 2122 2122 212

गज़ल / 39 / कसक दिल में

कसक दिल में रह गयी थी जो  सदी से  शूल बनकर। आ  रही   बाहर  अभी   वह  खूबसूरत  फूल बनकर। इश्क  का  आईन  तो  था  एक  -सा  सबके  लिए ही सिर्फ  इंसां  ही  खड़ा  क्यों   कटघरे  में  भूल बनकर। सूंघकर   देखो   हवा  यह   लाएगी   तूफान  भी  क्या या  सदा  अफवाह   बस  आती   रहेगी   धूल बनकर। 'दर्श'   ऐसे    ही   नहीं  दरिया   रहा   बहता    हमेशा खूब  तूने  था   संभाला   अंत  तक   दो  कूल बनकर। 2122. 2122. 2122  2122

कविता / 30 / बोलना मत बाद में ।

बोलना मत बाद में कि बताई नहीं मैंने भी वह बात तुम्हें जो पहले कभी किसी ने कही नहीं कि अस्थि - कंकाल में रहती नहीं मुस्कुराहट कभी और इसलिए इतिहास कभी वह दे नहीं सकता तुम्हें जबकि मुस्कुराहट मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन इसे लाएं कहां से खींच यह तय करना या ढूंढना तुम्हें है क्योंकि पाना तुम्हें है इसलिए मैं बताऊंगा नहीं कि किधर जाना है या कि कितना दूर अन्यथा खोज नहीं शुरू होगा द्वंद्व या युद्ध एक दूसरे के विरुद्ध व्यक्तिगत या सामूहिक एक चुटकी मुस्कुराहट के लिए ! बोलना मत बाद में कि बताया नहीं मैंने कि बदल गई हैं बच्चों की स्कूली प्रार्थनाएँ उनके शब्द , उनकी पुकार , कामनाएं या अभीष्ट क्योंकि अब बदल गए हैं उनके ईष्ट नया है सिलेबस समय का बिल्कुल स्कूल यूनिफॉर्म , पानी का बोतल , यहाँ तक कि पानी भी नया मुझे पता है तुम्हारा समय गया इसलिये आश्चर्य न हो तुम्हें आनेवाले उस कल पर जो बिल्कुल भिन्न होगा आज से और मुझे पता है तुम उस कल में खोजोगे अपना सारा कल बीता हुआ अजनबी होकर रहोगे खड़े हर एक चौराहे पर अपना ही शहर - गांव पूछेगा तुम्हें  परिचय या पता और तुम अ...

गज़ल / 38 / तेज धूप है

तेज  धूप  है  ठंढी  क्यों है  इस पर बहुत  विवाद है। सूर्योदय यह  देखो  मौलिक  है  या बस अनुवाद है।। झंडे  लेकर अपने - अपने   चले  गये  वे  चोटी  पर अलग-अलग उन नामों पर  क्यों घाटी में उन्माद है ? दीवारों पर दर्ज अभी -भी  कल का सारा सन्नाटा है भूल  गए  तो पढ़ लो इसको, अच्छा  है गर  याद है। सुबह - सबेरे जिस मुर्गे ने बांग भरी थी देखो जाकर कितना वह कैदी है कितना सचमुच  वह आजाद है। उजड़े ख्वाबों की  दुनिया में  इक बस्ती  ऐसी भी है जहां अभी  भी हर  घर -आंगन रौशन है, आबाद है। ---------३०/०६/२०१८ ,  गोवा ।

गजल / 37 / तंग गलियों में कहीं

तंग गलियों में कहीं खोया हुआ - सा। शहर है  जैसे  यहाँ  सोया हुआ - सा।। कौन लाएगा खबर भी होश की देखो रुख सभी का नशे में धोया हुआ - सा। ख्वाब जैसे रेत बनकर  रह गया फिर आदमी है  ख्वाब में बोया हुआ - सा। खेत बंजर था पड़ा  सुनसान वीरां में एक पुतला था खड़ा रोया हुआ - सा। जिंदगी  देती  रही  कंधा  भरोसे  का  और रिश्ता भी रहा  ढोया हुआ - सा। ------०९/०७/२०१८ , गोवा।

कविता / 29 / सोचकर कुछ और

सोचकर कुछ और वह डाल देता है मुझे बार - बार गहरे कीचड़ में और मैं धंस जाता हूं रोज जैसे कोई दलदल में आकंठ। मुस्कुराता, वह चला जाता है वापस मुड़ - मुड़कर पीछे देखते हुए मुझे आगे कहीं थोड़ी देर बाद हो जाता है ओझल रह जाती है मेरी सूजती आंखों में उसकी आकृति धुंधली हवा में डोलती सिहर उठता है शरीर जकड़ा हुआ कीचड़ में अकड़ा हुआ आकंठ रात - भर... और सुबह वापस आकर वह देखता है आश्चर्यित आंखों से - मेरा मुखड़ा आज भी खिल गया है कीचड़ की गंदली सतह पर जैसे कोई ताजा कमल उसे नहीं मालूम  शायद रहस्य गंदले कीचड़ में है या या उसे आकंठ सहने में अन्यथा वह कभी नहीं डालता कीचड़ मुझपर और मैं नहीं धंसता कभी और न ही खिलता मैं कभी कमल बनकर भी और इसके लिए जब मैंने कहा -धन्यवाद वह भी कीचड़ में उतर आया साह्लाद !        ---०६/०७/२०१८

कविता / 28 / कुछ पता नहीं चलता

कुछ पता नहीं चलता कब सुबह हुई , दोपहर भी कब या कि शाम काम ही काम बस दिवस - भर...और दिवस बीत जाता है । कुछ पता नहीं चलता क्या गया भीतर कितना और कितना निकल गया कुछ इन आती-जाती सांसों के साथ यंत्रवत् जीवन - भर ...और हर एक पल लगता रीत जाता है । कुछ पता नहीं चलता अक्सर असत्य ही होता मज़बूत बहुत बार तो हारता है सत्य ही भले ही अंत में  एक बार जीत जाता है।  ----  ०३/०७/ २०१८