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Showing posts from December, 2018

मुद्दा नहीं है अंधेरा

मुद्दा अब अंधेरा नहीं कहीं नहीं है अंधेरा डूबता नहीं है सूरज अब कभी कहीं रात आती होगी शायद नींद में और शाम तो जैसे सदी का सबसे बड़ा झूठ अन्यथा हुआ ही रहता है सबेरा ...

खिलना भूल जाने के पहले

खिलना भूल जाने के पहले … ढूंढ़ो, ढूंढ़ो और ढूंढ़ो कहां हूं मैं अगर नहीं हूँ जमीन में, आकाश में पानी में, हवा - बतास में आग में या वहाँ  इडेन  के बाग में, पहाड़ में, जंगल क...

मुक्ति - पर्व

मुक्ति - पर्व जो फूल तोड़ते हैं वे तोड़ते हैं सपने मरोड़ते हैं संभावनाएं मारते हैं जीवन हत्यारे हैं वे मनुष्यता के असंख्य बीज के ! वे जानते हैं फिर भी तोड़ते हैं फूल ...

घर

घर मत पूछो कब लौटता हूं घर कोई उत्तर नहीं है मेरे पास लेकिन चलता हूं रोज घर की ओर सोचकर कि कभी तो पा जाऊंगा इस रास्ते का वह छोर जहाँ होगा मेरा घर खड़ा मेरी प्रतीक्षा ...

अपना अपना भाग

अपना – अपना भाग देख लिया हमने चुआकर पसीना, बहाकर खून आंसू पी – पीकर देख लिया हमने जीकर अलग-अलग व्यवस्था में बदली गई व्यवस्था हमारे नाम पर हमारे लिए बाद में व्यवस्था हमें बद...

क्रिसमस कविता

क्रिसमस कविता ---------------------- इलाका रेतीला और पथरीला चल रही होगी ठंढी हवा दिवस बंज़र रातें बांझ गुमसुम सुबह उतरने नहीं देती होगी कोई गीत किसी की आवाज़ में कहीं कोई चिड़िया - चुनमुन नह...