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Showing posts from August, 2018

कविता / 34 / सुनो , कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...

दीवार

दीवार के साथ जीने की सदियों लंबी आदत, परंपरा बन जाती है बिल्कुल दीवार - सी ही ठोस और खड़ी हमें जीना पड़ता है इन्हीं दो दीवारों के बीच हमेशा दीवार हमारे बीच रहती है  और हम दीवारों के बीच हम  हम तोड़े जाते हैं समय - समय पर  टूटते जाते हैं हम  दीवारें नहीं हम कुछ बरस जीते हैं  दीवारें जीती हैं सदियां, सहस्राब्दियां...

कविता / / दिन

वही पहला दिन था इस पृथ्वी का जब उठा था धुआँ  नीचे चूल्हे से घास - फूस की छप्पर के ऊपर और पकी थी पहली रोटी ! और दूसरा दिन ? वह आजतक आया नहीं  हां, घोषणा हुई अवश्य बार - बार कि अभी आ गया है वह सपनों में काग़ज़ों पर उतारना है उसे  फिर आना ही उसे जमीन पर आखिर कागजों से जमीन की दूरी ही क्या है ! ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है ! जमीन पर ही उगते हैं पेड़ पेड़ से बनते कागज कागज पर उतरते कुछ सपने सपनों में दिखता वह दिन  वह दिन उतरेगा इसी पृथ्वी पर ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है !

कविता / 33 / जीवन ऐसा ही रहता है !

आश्रय का झूठा आश्वासन जैसे एक जर्जर छप्पर टंगा रहता बोये गए सपनों के कूट - स्तंभों पर कभी नहीं बनता वह पक्की छत सिर्फ इसकी लालसा या आस  तनी रहती है आस - पास या सिर के ऊपर आजीवन बारिश हो या तेज हवा करीब - करीब असंभव होता है बचना और दोपहर को उसके अनगिन सूक्ष्म छिद्रों से जब धूप नीचे गिरती है तो छांह में भी छेद है, स्पष्ट दिखता है ! इसी को कोई नियति लिखता है या कोई कहता है ज्यादा सोचो मत, जीवन ऐसा ही रहता है ! ---08/08/2018

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले

कविता / 31 / कम हो जाता है शहर

जैसे मापा जा सकता है मनुष्य को भीतर से वैसे ही इस शहर को इसके ऊपर से ! इसलिए वह थकी चिड़िया बिजली - खंभे के हिलते तार पर सुस्ताती, उदास किंचित् भयभीत है । वह उदास है कि शहर का क्षेत्रफल जितना बढ़ता है रोज उतना ही कम हो जाता है शहर और सिकुड़ जाता है उतना ही यहाँ लोगों का भीतरी आयतन वह भयभीत है कि खो रही है रास्ते की लंबाई सड़कों की बढ़ती चौड़ाई में चौड़ाते नाले में परछाई बढ़ रही है नगरपालिका के सफाईकर्मियों की डूब रहा है शायद सूरज इस शहर का और इसलिए वह चिड़िया आशंकित उड़ गयी है पेड़ की तलाश में और रह गया है वहाँ हिलता वह बिजली - तार नंगा पूरे शहर को देने के लिए रोशनी की सांत्वना या आश्वासन  ! ----6 अगस्त  2018, गोवा।

गजल / 41 / खबर है सारे सितारे

खबर  है  सारे  सितारे  कल  जमीं  पर आएंगे। आसमां वे  लौटकर  वापस  नहीं  फिर जाएंगे।। आसमां में नफरतों की  आग कब की बुझ गई हम जमीवाले ,  न जाने , होश में  कब आएंगे। रोशनी की  आहटें  जो सुन  अभी - भी सो रहे वक्त पे  सूरज  कभी   पहचान  वे  क्या पाएंगे ? फूल पत्थर पे चढ़ा  हासिल हुआ है क्या कभी   फूल पर अब  पत्थरों को  हम चढ़ाकर आएंगे। जिंदगी -भर  खाक छानी  सोचकर ये ही सदा खाक से  निकले  हुए हैंं  खाक में मिल जाएंगे। 2122. 2122. 2122 . 212 1st August 2018.